सोशल स्टोरी

ग़रीब की खुशियां – वो बड़ी तेज़ी के साथ घर मे आया और अपना स्कूल का बैग ज़मीन पे फेकता हुआ

“ग़रीब की खुशियां” – वो बड़ी तेज़ी के साथ घर मे आया और अपना स्कूल का बैग ज़मीन पे फेकता हुआ बड़बड़ाता हुआ अंदर कोने में जाकर बैठ गया, माँ घर पे नही थी, वो मासूम सा बालक 2 घण्टे से लगातार कोने में बैठ के रो रहा था

शाम होने को आयी सूरज गाँव के एक बड़े पेड़ के पीछे छूपने को हुआ, लेकिन जब से वो बालक भूखा प्यासा वंही बैठे रो ही जा रहा था, सूरज छुप गया चाँद अपनी चांदनी के साथ आसमान की रौनक बन गया, माँ घर मे आयी उसकी नज़रो ने घर के दरवाज़े तक को नही देखा सीधे अपने आंखों के तारे को आवाज़ देते हुए घर मे चली आ रही थी, बैग को ज़मीन पे पड़ा देख के दिल दहल गया.

मन ही मन मे सोचने लगी

“या अल्लहा आज क्या हुआ ?”

थोड़ा सा आगे बढ़ी कोने में से अंधेरे को चीरते हुए बेटे की सिसकने की आवाज़ कानों में पड़ी, दिल मे एक दर्द सी लहर दौड़ गयी, पलक झपकते ही अपने बेटे के पास पहुंच गई और अपने आँचल में छुपा लिया, और लड़खड़ाई आवाज़ से पूछने लगी.

” मेरे घर की रौनक तुझे आज क्या हुआ है, मैं जब भी आती थी तो दौड़ते हुए आता था और मुझे अपने नन्हे से हाथो में कैद कर लेता था, आज देख मै तेरे लिए सेब भी लायी हूँ” (जो काग़ज़ में लिपटा हुआ आधा टुकड़ा था, मानो ऐसा लगता था जैसे वो दोपहर से उस कागज़ में बंद था, वो टुकड़ा हल्का पीला पड़ गया था, उसका कुछ हिस्सा ऐसा लगता था जैसे किसी चीज़ से काट दिया गया हो वो सेब का आधा टुकड़ा शायद किसी अमीर बच्चे के घर का झूँठा था, जो आधा मुंह मार कर छोड़ दिया गया था)

उस बच्चे ने सेब के टुकड़े को एक तरफ रख दिया और पूरी सिद्दत के साथ माँ से चिपक गया, और अपने आँसुओ को लहराती हुई आवाज़ में अपने रोने की वजह माँ को बताने लगा

” अम्मा आज स्कूल में मुझे मेरे क्लास टीचर ने सबके सामने बुला के मेरे फ़टे हुए जूतों की हँसी बनाई और मुझे पूरा दिन क्लास से बाहार भरी दोपहरी में खड़े रहने की सज़ा दी, उसके बाद छुट्टी मेरे साथ के बच्चो ने भी मेरी हँसी बनाई”

इतना सुन ना था माँ के आंसू आंखों से आते हुए बच्चे के गाल पे आ गिरे, बच्चा तेज़ी के साथ उठा और अपनी कमीज़ की आस्तीन से माँ के आंसू पोछते हुए बोला ” अम्मा तू रो मत आज के बाद मैं स्कूल ही नही जाऊंगा, तू परेशान न हो”

माँ ने उसकी डांट लगाते हुए कहा और अपने आँसुओ को हँसी में तब्दील करते हुए कहा ” शैतान स्कूल न जाने का अच्छा बहाना है, तुम कल स्कूल नही जाओगे, और तुम्हारे जूते कल ही आ जायेंगे, और हां मैं रोटी बना देती हूं खा कर सो जाना” ये कहते हुए माँ चूल्हे की तरफ बढ़ गयी.

और चुपके से अपने दुप्पटे में बंधी हुई रोटी और दुकान से लिए अचार को थोड़ी देर बाद बच्चे के सामने ले जाकर रख दिया, बच्चा अपनी माँ की गोद मे बैठ के ख़ुसी के साथ खाना खाने लगा, और बीच बीच मे एक टुकड़ा अपनी माँ को खिला देता खाना खत्म करके हाथ धोये और उस सेब की टुकड़े की तरफ भागा जो गुस्से में कोने में रख दिया था, उसके ऊपर से कागज़ हटा ते हुए उस सेब को पूरा खा गया,

“माँ ने आवाज़ लगाई बेटा सुबह को मै जल्दी चली जाऊंगी काम पे तुम चूल्हे पे रखी चाय को ये रोटी जो बची है उस से पी लेना,

बेटा मुंह मे रखे सेब को गले से नीचे उतारते हुए बोला ” अच्छा अम्मा पी लूंगा” और भागता हुआ अपनी माँ के पास आकर लेट गया, और सो गया

लेकिन माँ की आंखों में नींद कंहा थी आसमान के चाँद को निहारते हुए अपने पुराने दिनों को याद कर रही थी और सुबह पत्तो पे पड़ी ओश की बूंदों की तरह अपने आंसू बहा रही थी, सोच रही थी वो भी क्या दिन थे जब इसके बापू ज़िन्दा  थे(एक बड़ी इमारत में काम करते वक़्त वो 3 मंज़िला इमारत से गिर गए थे, रीढ़ की हड्डी में और सर में हद से जाएदा चोट आई थी, 3 दिन में अस्पताल में जिदंगी से हार गए और इस दुनिया से चले गए, मुआवज़े के लिए आज भी सरकारी कागज़ों को पूरा कराने के लिए महीने में 3 चक्कर सरकारी दफ्तरों के लग जाते है, लेकिन अब उम्मीद टूट चुकी है ) , घर मे तीन वक़्त की रोटी होती थी, रसोई घर के बर्तन जायदातर भरे रहते थे लेकिन उस हादसे ने सब कुछ छीन लिया, यही सोचते सोचते कब सुबह हो गयी पता ही नही चला, चाय बना कर माँ घर से चली गयी सुबह आंख खोलते ही बच्चे ने पहले माँ को ढूंढा लेकिन शाम की बात याद आते ही रसोई में गया और शाम की रोटी जो आधा टुकड़ा बची थी उसको चाय के प्याले में तोड़ा और खा गया और अपने स्कूल से दिए काम को करने लगा, छोटी से पेंसिल (जिस पे शायद किसी पेन की कैप लगा कर उसको हाथ मे पकड़ने लायक बना लिया था) से अपने काम को खत्म किया

उधर माँ अपने मालिक के यँहा पहुँच गयी थी जँहा वो बर्तन साफ करने से लेकर उसके बच्चो की देखभाल तक करती थी (क्योंकि उसका मालिक और मालकिन दोनों सरकारी नौकर थे सुबह दफ्तर जल्दी जाना होता था इसलिए सारा काम उसी को करना पड़ता था ) दो बच्चे जिन्हें मालिक स्कूल छोड़ते हुए दफ्तर निकल जाते थे, एक बच्चा घर रह जाता था जिसकी देख भाल उसको खुद करना पड़ती थी,

शाम को मालकिन लौटी तो उसने अपनी जरूरत को उनके सामने रख दिया ” मालकिन वो ज़रा” इतना कह के वो रुक गई, मालकिन एक अच्छी विचारों वाली महिला थी, चेहरे पे मुस्कान के साथ बोली ” अर्रे क्या हुआ बोलो पैसों की जरुरत है, या फिर आटा-चावल”

माँ ने एक सांस में कहा “नही कल वो उसके बच्चे को जूते फ़टे हुए होने की वजह से ज़रा तकलीफ उठानी पड़ी”

मालकिन  कमरे में गयी और 100 -100 के दो नोट देते हुए बोली लो नए ले लेना

“नही मालकिन वो छोटे मालिक के जूते है पिछली साल के जिनमे हल्की सी कील लग गयी थी वही दे दो”

मालकिन मुस्क़ुराइ और बोली जाओ ले लो और ये पैसे भी रख लो, पैसे वापस करते हुए बोली “नही मालकिन जिस दिन जरूरत होगी ले लूंगी पैसे”

शाम को जल्दी घर लौट गई दुप्पटे के पल्लू में बंधी रोटी (मालकिन ने इजाज़त दे दी थी की जरूरत के हिसाब से रोटियां घर ले जाया करो), और हाथ में जूते लिए हुए तेज़ी से घर की तरफ बड़े जा रही थी, घर के करीब पहुचती है देखती है बच्चा दरवाज़े पे ही बैठा खेल रहा था माँ को आता देख कर वंही से भागना शुरू कर दिया और जाकर माँ से लिपट गया, और जूते देख कर तो उसकी ख़ुसी का ठिकाना ना रहा, घर पहुचते ही उसने जूतों को पहनते हुए बोला-

“माँ थोड़े कसे हुए है लेकिन फिर भी अच्छे हैं” जूतों को ले जाकर एक कोने में रख दिया और बार बार जाता और उनको देख कर खुश हो जाता

सोते वक्त अपनी माँ के हाथों पर सर रख कर एक मुस्कान लिए सो गया

(जिलानी अंसारी)

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