सोशल स्टोरी

अधूरे ख़्वाब – मेरे पापा की खुशी का ठीकाना न रहा जब उन्हे पता चला के, उनकी दुनिया मे एक खूबसूरत नन्हा मेहमान आने वाला है

अधूरे ख़्वाब – मेरे पापा की खुशी का ठीकाना न रहा जब उन्हे पता चला के, उनकी दुनिया मे एक खूबसूरत नन्हा मेहमान आने वाला है। कितनी तैयारियां की थी । उन्होने मेरे आने की यह न जानते हुऐ के मे लड़की हुं या लड़का। दाद दादी की तमन्ना थी की लड़का हो। पर मेरे पापा ने इन बातो पर तवज्जो नही दी। जब उन्हे मेरे पैदा होने की खबर मिली तो उनकी खुशी का ठीकाना न रहा। हांलाकी लोगो ने उनसे दबी ज़बान मे कहा भी के लड़की के पैदा होने पर इतने खुश क्यो हो। होते भी क्यो न पहली औलाद जो थी उनकी।कितने नाज़ो से पाला था उन्होने

इतना गरीब होते हुए भी।मुझे आज तक पापा ने नही बतायाके उन्होने मेरी पैदाइश की खुशी मे दावत देने के लिये मेरी माँ का सोने का हार गिरवी रख दिया। जो वो कभी वापस हासिल न कर सके।इतनी गरीबी के बाद भी मुझे शहर के सबसे अच्छे स्कूल मे तालीम दीलवाई।

मेरी हर मांग हर ख्वाहिश पूरी। और मुझे शर्म आती थी जब वो मुझे अपनी पुरानी साइकिल से स्कूल छोडने जाते थे। मेरे छोटे भाई बहन हर उस चीज़ के लिये तरसते रहे जो मुझे हासिल थी। जब भी वो ज़िद करते तो माँ उन्हे तस्लली देकर कहती थी। बहन की जब अच्छी नौकरी लग जायेगी । तब वो तुम्हारे सारे ख्वाब सारे अरमान पूरे करेगी एक दिन

कभी बेटी समझा ही नही था माँ बाप ने मुझे, हमेशा बेटा कहा था। वक्त अपनी रफ्तार से गुज़र रहा था। मेरा स्कूल पूरा हो चुका था। मेरे छोटे बहन भाई अपनी पड़ाई पुरी न कर सके। क्यो कि अकेले पापा किस किस का पूरा करते। पता ही नही चला वक्त ने कब उनके काले बालो को स्याह कर दिया। चेहरे की चमक वक्त की धूप ने छीन ली। पर मेने कभी उनपे ध्यान तक नही दिया। उल्टा ये ज़रूर दिल मे हसरत रहती थी। क्यो मे किसी अमीर घर मे पैदा नही हुई। कितनी खुदगर्ज़ थी मे। मेरी इंजीनियरिंग कम्पलीट कराने के लिये पापा ने बेंक से लौन लिया था। फिर एक दिन वो आया के उनको मुझ पर बोहत नाज़ हुआ। मेरा सिलेक्शन एक बडी कम्पनी मे हो गया था। सैलेरी पैकज अच्छा था।

मे बहुत खुश थी ।अब मेरे सारे अरमान पूरे हो सकेंगे।मे हमेशा से बडे से घर और बडी सी गाड़ी की तमन्ना रखती थी। जब आफिस ज्वाइन किया तो बाहर कि दुनिया और हसीन लगने लगी। फ्री होने पर भी घर के बजाऐ बाहर घूमना और फालतू पैसै उड़ाना अच्छा लगता था।

घर वालो की सोच दकियानूसी लगने लगी। आऐ दिन घर वालो से झगड़े होने लगे। दिल चाहता के सब कुछ छोडकर कहीं चली जाऊं।माँ बाप के अरमान सीने मे ही दफ्न हो गये अपने मुंह से कभी एक पैसा भी नही मांगा था मुझसे।

फिर अचानक एक दिन घर पे कोरियर से एक लिफाफा आया।

“जो बैंक से था”

लोन कि पहली किस्त जमा करना थी।मै तो अपनी सारी सैलेरी शॉपिंग और पार्टीयों मे उड़ा दे ती थी। पापा कि ज़रा सी कमाई थी । वो माँ के इलाज मे लग जाती थी। इसी तरह दो लैटर आयें।पापा ने बडे सर्द लहजे मे कहा था । मुझ से……

“बेटा….. वो कुछ पैसै ….. महीने के…..”

और किस तरह से झिड़क दिया था उनको, बेचारे एक ठंडी आह भर कर रह गये थे।। दूसरे दिन मे आफिस जा रही थी।

अचानक सामने से आती कार ने मुझे टक्कर मारी होश आया तो अस्पताल मे थी। पापा का बहुत बुरा हाल था। दिल अपने ठिकाने पे न था। बस रोये जा रहे थे,डाक्टर्स ने कहा मे

रीढ़ की हड्डी में दिक्कत है। आठ दिन मे आपरेशन करना होगा।6-7लाख खर्च होंगे उसके बाद भी कह नही सकते आप कि बेटी कितने दिन मे चल पायेगी।

हो सकता है महीने भी लग जायें। घर वालो पर जैसै मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था। कहीं से कोई इंतेज़ाम नही था। रक़म कोई मामूली नही थी।पापा पैसो का इंतेज़ाम करने का कहकर चले गये।

5 दिन बाद रहमान मामू का फोन आया ।अम्मी से कह रहे थे। बहनोई साहब को मैंने जामा मस्जिद मे चंदा मांगते हुऐ देखा। हिना के आपरेशन के लिये। बाजी आपने हमे इतना भी नही समझा। अम्मी के आसुंओ का सैलाब टूट पड़। गिर कर बेहोश हो गयी थी।

तीन दिन बाद मे आपरेशन थियेटर मे थी।पापा की एक झलक देखी थी। इतना बदहाल,परेशान कभी नही देखा था उन्हे।

अल्लाह।

तूने मेरे जैसी खुदगर्ज़ लड़की को बचाया ही क्यों ? मेरी बदनसीब माँ ने मुझे पैदा होते ही क्यों न मार दिया था। या अल्लाह मुझे माफ कर देना। मेरे माँ बाप ने सारी खुशियां मुझ पर न्यौछावर कर दीं।औऱ मै एक दिन का सकून भी न दे सकी उन्हे।

पापा की तरफ देखा औऱ

वो मेरे पास खडे थे। मिलने कि इजाज़त मांग ली थी। अपने दोनो हाथों से मेरा चेहरा थाम रखा ।.

आंखो मे आंसू थे।जो गालो से ढलक कर दाढी को भिगो रहे थे। पापा दुनिया को कभी न बताना के मैं इतनी खुदगर्ज़ थी वरना कोई बाप अपनी बेटी पे भरोसा नही करेगा। खुदा के लिये मुझे माफ कर देना.

अब कभी इंशाल्लाह शिकायत का मौक़ा नही दुंगी।

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